Thursday, September 6, 2012

:: ये बारिश कुछ कहती है - कविता ::



वो आकाश, वो बादल,
घर होंगे ना उस बूंद के,
जिससे बिछड़ कर वो धरती की तरफ बढती है |

प्यास बुझा कर इस धरती की,
कितनो को हरती है |

'बारिश'
सौम्य, सज्जन, नेक,
तूफानी, भयंकर, तेज. . .
कितने ही तरीके, इसे देखने के |

बारिश की वो आवाज, वो सुगंध, वो नरमी, वो ठण्ड, वो प्यास, वो तपन, वो एहसास,
क्या बारिश एक मौसम है, या एक पल, या की कोई मुहावरा. . .

ना आये तो पूजा-पाठ, जब आये तब हाहाकार,
कितनी अरमानी और मिश्रित है हमारी ये बारिश. . .

उर्दू सी पाक, हिंदी सी चंचल, संस्कृत सी शुद्ध और अंग्रेजी सी अजनबी,
हा ये बारिश है, गीली है, ये बारिश है ||

[मेहुल नेवासकर द्वारा कृत]

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