Thursday, August 23, 2012

कविता - फलसफा"



मैं बहुत कुछ लिखता हू,
लिखता हू, पर किसी को दिखाने से डरता हू,
विचार उमड़ते है, पर बोलने से डरता हू,
चाहता हू कुछ हो, पर करने से डरता हू,

समाज मैं रहता हू, पर इस समाज से डरता हू,
लोगो के बीच मैं अपनों से डरता हू,
कुछ करना पड़ेगा, इसीलिए मैं सोचने से डरता हू,
सहम के डरता हू, डर के डर से डरता हू,
हर पल, हर छीन से डरता हू,

इस डर के डर से कलम उठाता हू,
लिखता हू, डर को उकेरता हू,
लिख के डरता हू, डर के लिखता हू,
मैं बहुत कुछ लिखता हू,
लिखता हू, पर किसी को दिखाने से डरता हू ||

मेहुल नेवासकर - फलसफा"

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