इस आज-कल के चक्कर मैं,
ना आज कुछ हुआ, ना कल कुछ होगा |
इस तू और मैं के चक्कर मैं,
ना इसका कुछ हुआ, ना उसका कुछ होगा |
टाल देने की ये फितरत, युही बढती रहेगी सदा,
ना ये थमेगी कभी, ना तू इसे थाम पायेगा |
किनारे ही मंजिल होती है लहरों की हमेशा,
जो ये बन जाये सुनामी, तो कोई ना इसे रोक पायेगा |
समझ बात को, कर एहसास,
दुनिया भूल जाएगी तुझे और तू कुछ ना भूल पायेगा ||
(मेहुल नेवासकर द्वारा अण्णा हज़ारे को समर्पित)
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