Friday, June 7, 2013

सच, समाज और हम. . .

अपनी क्लास से दिमागी कसरत करके बस घर पहुँचा ही था की घर के पास बन रही बिल्डिंग में एक नज़ारा देख थोडा अचंभित हुआ. . .

पत्थरों से भरी लोहे की टोकरी अपने सर पर उठाए एक जगह से दूसरी जगह डालता, वो, लोहे की टोकरी यकिनन इतनी गर्मी में पूरी तरह से गरम होगी और उसको अपने सर पर लिए वो बिना कोई दर्द या दुःख झलकाए निरंतर काम कर रहा था, अभी-अभी आये बड़े-बड़े पत्थरों के ट्राले से पत्थर निकालने मैं मदद करता और फिर कुछ ही देर बाद एक बड़ा सा हथोडा लिए उन पत्थरों को तोड़ता, जिस प्रक्रिया मैं उसे यकिनन ज्यादा वक़्त लगना है क्योकि वो बड़ा हतोडा उससे उठाए नहीं उठ रहा. . .

ये सब अगर मैं किसी मजदुर को करते देखता तो थोडा तरस खता और अपनी "थोड़ी" बेहतर जिन्दी के लिए इश्वर को शुक्रिया कहता मैं, अपनी गाडी टिकाये घर में प्रवेश कर जाता, पर ये काम शायद ऐसे ही किसी मजदुर का बेटा कर रहा था जो शायद अभी-अभी अपने "टिन-ऐज" में गया होगा ।
मैं वही रुक गया ये सोचते हुए की अब मुझे क्या करना है, पर बड़ी देर तक सोचने के बाद भी जब कोई उपाय नहीं सुझा, या कहे की सारे सुझाए उपाय मुझे अपने कानून की तरह ही अंधे और खोखले लगने लगे तो मैं उसको उसके काम में ही छोड़ घर में चला गया, ये वाकया 8-9 दिन पुराना है और तब से मैं यही सोचे जा रहा हूँ. . .

क्या मैं उसके पास जा कर उसको अपनी सहानुभूति दिखाता?
अगर ऐसा करता तो शायद उसके मन में भरी नफ़रत, जो की शायद पूरी दुनिया के लिए हो, को महसूस कर उलटे पाव लौट आता ।

क्या मैं उसे कुछ रुपये दे कर, उसकी कोई मदद कर पाता?
ये एक हास्यास्पद कदम होता क्योंकि या तो वो मेरे द्वारा दी जा रही भीख को कुबुल नहीं करता, या उन पैसो को कुबूल करता भी तो शायद किसी गलत काम, जैसे कोई बुरी आदत, मैं इस्तेमाल करता, या पता नहीं शायद उसके माँ या बाप उससे ये पैसे छीन लेते ।

क्या मैं वहा के कांट्रेक्टर से इस सम्बन्ध में बात करता, या फिर बचपन बचाव जैसे किसी संगठन को सूचित करता?
ये शायद मेरे लिए आत्मघाती होता, कुछ हफ्तों पहले एक निर्देशक द्वारा बनाई एक लघु फिल्म मैंने देखि थी जो की शायद कांस समारोह मैं शायद दिखाई गयी थी, जिसमे की भारत मैं बनी एक अंग्रेजी फिल्म "Slumbdog Millionare" मैं काम करने वाली रुबीना की कहानी दिखाई गयी है, की कैसे वो एक इतनी बड़ी फिल्म का हिस्सा बनने के बाद भी आज फिर उन्ही परिस्थितियों में रहने को विवश है, किस तरह हमारे ही समाज के बड़े-बड़े लोगो द्वारा उनको किये गए वादे सिर्फ खुद का प्रचार करने के साधन थे और किस तरह उस लड़की की माँ हमारा ही "नंगा" सच हमारे ही सामने अपने रोज के काम निपटाते हुए सहज ही कह देती है ।

मेरे साथ ही अभी दो बार ऐसे वाकिये हुए जिसमे मेरा सामना इस व्यवस्था से हुआ, एक, जब मैं अपना पासपोर्ट बनवाने गया, दूसरा, जब मेरी मोटर साइकिल चोरी हुई, मैंने सुना था की "उम्मीद पर दुनिया कायम है", पर इन दोनों वाकियो के बाद न ही उम्मीद बची और या ना ही ये दुनिया रास आई, हाल ही के उदाहरण देखिये, एक देशद्रोही अपने घर से इम्पोर्टेड कार में बैठ कर अपनी मर्ज़ी से सजा काटने जाता है, जहाँ वो सिगरेट, घर के खाने आदि बातों की मांग करता है और लग-भग उसकी सारी मांगे मान ली जाती है और वही दूसरी तरफ एक बेकार से खेल में एक बेकार सी हरकत करने के लिए एक ख्याति प्राप्त खिलाड़ी जब पैसे लेता है तो उसे इस तरह से मीडिया के सामने पेश किया जाता है जैसे की कोई आतंकवादी पकड़ लिया गया हो, हाथ में बंधी चैन, मुह पर काला कपड़ा. . .

खैर जब किसी को आज-कल किसी भी बात से कोई फरक ही नहीं पड रहा तो मैंने भी सोचा की उस लड़के को एक मजदुर की ज़िन्दगी ही जीने देता हूँ, कही उसको उस काम से बहार निकला कर एक पढ़ा-लिखा, सोचने-समझने वाला "इंसान" बना दिया तो कल को मुझसे ही पूछेगा, क्यों लाये मुझे इस "समाज" नामक नर्क मै. . .
और मेरे पास उसको "उम्मीद" के सिवा देने को कोई जवाब नहीं होगा. . .

- मेहुल नेवासकर