Tuesday, June 5, 2012

:: एक कविता ::




जी सर, 
थोडा बहुत लिख लेता हू,
कुछ एक शब्दों को धागे मैं पिरो लेता हू |

अपने जज्बात, अपनी सोच, अपनी बात को इन्ही शब्दों मैं कह देता हू,
हँस लेता हू, हँसा लेता हू कभी जमे तो रुला देता हू,
जी सर, 
थोडा बहुत लिख लेता हू |

कभी उम्मीद की खातिर, कभी पैसो के लिए तो कभी युही, कलम उठा लेता हू,
कभी-कभी तो की-बोर्ड से भी काम चला लेता हू,
कभी तीव्र तो कभी शांत, कभी विचलित तो कभी उदास,
जैसी जरुरत हो वैसा समां बना देता हू,
जी सर, 
थोडा बहुत लिख लेता हू |

कभी देश, कभी दुनिया तो कभी खुद को नींद से जगा देता हू,
कभी आवाम का सुर, सुर से मिला देता हू. . . .
क्या बताऊ सर,
थोडा ही सही पर लिख लेता हू ||

[
मेहुल नेवासकर]

1 comment:

  1. ji sir, aap bohot accha likh lete hain....
    hamare manon ke andar jhaank lete hain...
    sab ki baatein samjhane ka zariya dete hain
    ji sir,aap bohot accha likha lete hain... :)

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