Wednesday, July 4, 2012

:: बस यु ही ::




कदम तो हर कोई बढ़ा रहा है,
पर कोई कही पहूच नहीं रहा |

बातें तो हर कोई कर रहा है,
पर बातों मैं जादू कोई जगा नहीं रहा |

वकालत तो हर किसी की हो रही है यहाँ,
पर यकी किस पे आ नहीं रहा |

दिखावे मैं सब एक से बढ़कर है,
पर दिल मैं कोई उतर नहीं रहा |

ख़ास-ए-आम और आम-o-ख़ास का दर्द बहुत जुदा है,
पर उस दर्द को कोई सहला नहीं रहा |

हम वतन की बातें करते है सारे जहाँ मैं,
पर उस वतन की रक्षा कोई कर नहीं रहा |

कितनी ही बातें है, कहना चाहता हू मैं,
अफ़सोस, इन बहरो की दुनिया मैं कोई सुन नहीं रहा ||


मेहुल नेवासकर | बूझो तो जाने'

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